होश (awareness) ही ध्यान है । - रजनीश ओशो
मेरे प्रिय
प्रेम ,
आत्मा या परमात्मा या अनात्मा-जैन, हिन्दू या बौद्ध- सभी शब्द अंश- सत्य को प्रकट करते है।
और पूर्ण सत्य अभिव्यक्त नहीं होता है ।
क्योंकि शब्द उसके लिए अति छोटे और संकरे है ।
इसलिए शब्दों में न उलझें और जो भी ठीक लगे-रूची अनुकूल हो,उसे चुन लें ।
और कोई भी शब्द न चुनें,तब भी साधना में कोई बाधा नही पड़ती है ।
वस्तुतः तो, बाधा शब्दों के आग्रह से ही पड़ती है ।
यहूदियों का जो परमात्मा के लिए जो शब्द है, वह है याहवेह (Yahveh) या यहोबा (Yahoba) और उसका अर्थ होता है अनाम (no name or nameless)
सिध्दांतों, शास्त्रों और वादों से सत्य की खोज का दूर का भी संबंध नहीं है।
इसलिए, शास्त्रों से बचे तो अच्छा है ।
अन्यथा, साधना से बच जायेंगे ।
साधना करें -साक्षी-भाव की ।
विचार हों या भाव, क्रियाएं हो या प्रतिक्रियाएं - सबके प्रति साक्षी (Witness) हो ।
जीवन-धारा बेहोश(unconscious) न रहे ।
होश (awareness) का ही ध्यान करें ।
होश ही ध्यान है ।
और शेष प्रभु पर छोड़ दें या याहवेह पर - जिसका की कोई नाम नहीं है ।
शेष एक प्रश्न का उत्तर नही दूंगा - क्योंकि वह साधना के लिए व्यर्थ है । यह नहीं कि वह प्रश्न ठीक नहीं है - न ही यह की उसका उत्तर नही है। वरन इसलिए कि वह सत्य के साधक के लिए असंगत (irrelevant) है ।
ओशो
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अंतर्वीणा
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