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Showing posts from November 27, 2017
पद्मश्री डॉ. शिवमंगल सिंह "सुमन" घर आगन में आग लगी है, सुलग रहे वन-उपवन दर दीवारें चटख रही है । जलते छप्पर-छाजन तन जलता है, मन जलता है । जलता जन-धन जीवन एक नहीं जलते सदियों से  जकड़े गर्हित बंधन दूर बैठकर ताप रहा है, आग लगाने वाला । मेरा देश जल रहा, कोई नहीं बुझाने वाला ।