पद्मश्री डॉ. शिवमंगल सिंह "सुमन"
घर आगन में आग लगी है,
सुलग रहे वन-उपवन
दर दीवारें चटख रही है ।
जलते छप्पर-छाजन
तन जलता है, मन जलता है ।
जलता जन-धन जीवन
एक नहीं जलते सदियों से 
जकड़े गर्हित बंधन
दूर बैठकर ताप रहा है,
आग लगाने वाला ।
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझाने वाला ।

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