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यह इश्क है दीवानों का* प्रथम अंक

गुमनाम नाम से शुरू होती है यह इश्क की कहानी ना पता न रता की है वो कौन है ...? नाम मात्र से बढ़ता है यह लगाव, चाहत होती है जानने की आखिर वह होगी कैसे एक दिन की बात है जब अचानक नायक को नायिका से मुलाकात एक कार्यक्रम के दौरान होती है । नायक के मन में लड्डू फुट रहे होते है की जिसे जानने की चाहत मात्र नामसे हो रही थी वह उस समय उसके सामने सहमी सी बैठी थी । जब कार्यक्रम की शुरुवात हो जाती है और नायक और नायिका एक ही मंच में होते है तो नायक और भी खुश हो जाता है, पर नायिका को इस बात की भनक भी नहीं लगती की कोई उसे निहार रहा है या यूं कहें ताड़ रहा है, कार्यक्रम की समाप्ति होने को होती है तब नायक अपने चतुराई से उसके संपर्क नंबर लेना चाहता है और वह अपनी डायरी निकाल कर सभी को अपना अपना मोबाइल नंबर लिखने को कहता है ,सभी मंच में बैठे अतिथियों ने नंबर लिख दिया साथ ही नायिका भी लिख देती है कुछ दिनों के बाद नायक ,,,,,डरते डरते मौके के   तलाश में रहता है की कब उसे (नायिका) को फोन करें ,इसी बीच होली का समय रहता है और वह इस मौके को सही समझ कर नायिका को फोन कर होली की शुभकामनाएं देता है । यह सब...