मन करता है लौट जाऊ उस गली में
बहुत मन होता लौट जाऊ उस #गली में जहाँ से चले थे ये कदम एक अनजानी #मंजिल की और सो जाऊ उन #बिस्तरों पर जो इतने #मुलायम नही थे पर थे बहुत #खास घूम आऊ उन रास्तो पर जो #अनजान होकर भी जाने पहचाने से थे कर लूँ कुछ उछल #कूद उस #मैदान पर जो कुछ ना होकर भी बहुत खास था मेरे लिए मिल जाए वो #स्लेट और #क़िलम जिस पर घिसा करते थे भविष्य की #इबारत #पिट जाऊ फिर एक बार उन गुरु से जो बना गए वो अभेद इमारत सोच लूँ फिर से #अजीब बुन लूँ वो #हसीन सपने जो रह गए बस ख्बाब बनकर । याद आ रहा #बचपन फिर से एक बार। बहुत मन होता लेखक:- श्री अमित सिंह (एस.डी.ओ.)