कौन कहता हैं कि मेरा भारत देश गरीब हैं ?
निर्मल साहू (एड.) :- हमारा भारत हमेशा से कृषि आधारित अर्थव्यवस्था में निर्भर था और अभी भी हैं जब १७७० की बात करे तो भारत और चीन की कृषि उत्पादन लगभग ७० प्रतिशत पूरे विश्व की तुलना में थी, और किसान वर्ग धनी था उस समय एक कहावत भी प्रचलित थी " उत्तम खेती मध्यम वाड़ करे चाकरी कुकर निदान " अर्थात कृषिकर्म उत्तम व्यपार मध्यम और नौकरी तो कु्क्ते के समान थी, लेकिन आज किसान अचानक भयंकर गरीब हो गया बात समझ में नहीं आती क्यो, देश गरीब हो गया ये तो और भी न समझ बात हुई ,
वास्तविकता की ओर देखे तो कृषक सम्पूर्ण रूप से चाहे वह खघ्दय पदार्थ हो, बीज, कृषि उपकरण , स्वाथ, एवं चिकित्सा हो सरकार के भरोसे हो गया है जिससे वह अपने जरूरी समान भी खरीदने लगा हैं जबकि वह पूर्व में स्वय निर्माण करता था,
दूसरी ओर सरकार भी कृषि उपयोगी तमाम योजनाएँ संचालित कर रही बैं और चल रही हैं लेकिन जमीनी स्तर में देखा जाए तो ये केवल नौकरसाहो की जगीर मात्र बनकर रह गई हैं ,
हर किसान भटक रहा हैं जिससे देश कि अर्थव्यवस्था भी लड़खढा रही है, हॉ जिसके पास पैसे है तो दिंन दूगना रात चौ गूना हो रही हैं जिससे जो गरीब है तो गरीब होता जा रहा है और जो आमीर हैं तो आमीर होता जा रहा हैं ,
कौन कहता है देश गरीब हैं हमारे यहा अपार कृषि आधारित , वन्य औषाधी है केवल इनका सही उपयोग करके देश की अर्थव्यवस्था को मुख्यधारा में लाया जा सकता हैं जो कि सम्भव हैं,
लेकिन इसके लिए जो व्यर्थ की अड़ाम्वर है उनहें अलग करना होगा, जैसे दिल्ली में चालू हालत में खड़ी ट्रेन मा. राष्ट्रपति के लिए चाहे वे इस पर आवा गमन करे या न करे इसके खड़े होने का खर्चा प्रतिदिंन का लगभग १.५० लाख ₹ है, इसी प्रकार अनेको अनेक है ,
फिर मैं कहता हू मेरा देश गरीब नहीं हैं परिस्थितिया हमें गरीब बना दी हैं
जय हिंद !!!
वास्तविकता की ओर देखे तो कृषक सम्पूर्ण रूप से चाहे वह खघ्दय पदार्थ हो, बीज, कृषि उपकरण , स्वाथ, एवं चिकित्सा हो सरकार के भरोसे हो गया है जिससे वह अपने जरूरी समान भी खरीदने लगा हैं जबकि वह पूर्व में स्वय निर्माण करता था,
दूसरी ओर सरकार भी कृषि उपयोगी तमाम योजनाएँ संचालित कर रही बैं और चल रही हैं लेकिन जमीनी स्तर में देखा जाए तो ये केवल नौकरसाहो की जगीर मात्र बनकर रह गई हैं ,
हर किसान भटक रहा हैं जिससे देश कि अर्थव्यवस्था भी लड़खढा रही है, हॉ जिसके पास पैसे है तो दिंन दूगना रात चौ गूना हो रही हैं जिससे जो गरीब है तो गरीब होता जा रहा है और जो आमीर हैं तो आमीर होता जा रहा हैं ,
कौन कहता है देश गरीब हैं हमारे यहा अपार कृषि आधारित , वन्य औषाधी है केवल इनका सही उपयोग करके देश की अर्थव्यवस्था को मुख्यधारा में लाया जा सकता हैं जो कि सम्भव हैं,
लेकिन इसके लिए जो व्यर्थ की अड़ाम्वर है उनहें अलग करना होगा, जैसे दिल्ली में चालू हालत में खड़ी ट्रेन मा. राष्ट्रपति के लिए चाहे वे इस पर आवा गमन करे या न करे इसके खड़े होने का खर्चा प्रतिदिंन का लगभग १.५० लाख ₹ है, इसी प्रकार अनेको अनेक है ,
फिर मैं कहता हू मेरा देश गरीब नहीं हैं परिस्थितिया हमें गरीब बना दी हैं
जय हिंद !!!

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